तेलंगाना की लोकसंस्कृति का गौरव है फूलों का रंगारंग उत्सव बाथुकम्मा । इसमें अलग अलग इलाकों के फूलों के साथ खुशियां मनाई जाती हैं । यह उत्सव धरती, पानी और मनुष्य के बीच अंतरंग रिश्तों का उत्सव है, सेलीब्रेशन है । इस दिन फूलों के साथ फूलों और प्रकृति का जश्न मनाया जाता है ।
मशहूर क्रांतिकारी शायर और तेलंगाना के मुक्ति संग्राम में बंदूक लेकर लड़ने वाले मखदूम मोहियुद्दीन की बेमिसाल ग़ज़ल है, जिसकी प्रेरणा यकीनन फूलों की इसी बारात से मिली होगी ।
फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बारात फूलों की ।
फूल के हार, फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की ।
आपका साथ, साथ फूलों का
आपकी बात, बात फूलों की ।
नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं
मिल रही है हयात फूलों की ।
कौन देता है जान फूलों पर
कौन करता है बात फूलों की ।
वो शराफ़त तो दिल के साथ गई
लुट गई कायनातफूलों की ।
अब किसे है दमाग़े तोहमते इश्क़
कौन सुनता है बात फूलों की ।
मेरे दिल में सरूर-ए-सुबह बहार
तेरी आँखों में रात फूलों की ।
फूल खिलते रहेंगे दुनिया में
रोज़ निकलेगी बात फूलों की ।
ये महकती हुई ग़ज़ल 'मख़दूम'
जैसे सहरा में रात फूलों की ।
यह पोस्ट उन जबरदस्त क्रान्तिधर्मियों को प्यार सहित समर्पित जो सीताराम येचुरी के इस फोटो पर हाय रब्बा करते हुए, मन्नाडे के कमाल के गीत की तर्ज में लगत करेजवा में चोट लिए मार फूले-फूले घूम रहे हैं । इस गुजारिश के साथ कि अमां यार, थोड़े तो इंसानों जैसे दिखो !! फूल-पत्ती-उत्सव-कला-लोक से मत डरो । इतने डरावने मत बनो कि फूल तक सहम जायें.







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