पूंजी निवेश कराकर झारखण्ड विकास की बात हो रही है I निवेश के बदले – झारखण्ड की संसाधन मुहैया की जा रही है I यह सच है की झारखण्ड में प्राकृतिक संसाधन प्रचूर मात्रा में मौजूद है- जैसे- कोयला, तांबा, सोना, लोहा, यूरेनियम , ग्रेनाइट, ग्रेफाइट, अबरक, आदि I
झारखण्ड सरकार ने मोमेंटम झारखण्ड में निवेशकों को आकर्षित करने के लिए परियोजनओं की विस्तृत जानकारी अपनी वेबसाइट में करायी है , जिसमे 14 सेक्टर में 88 परियोजनाए शामिल की गयी है I इन परियोजनओं पर 210 एम ओ यू करार किये गए है और जिसमे अनुमानित 3.5 लाख करोड़ रूपए का निवेश होगा I कहा जा रहा है की इससे करीब 6 लाख रोज़गार उपलब्ध होगा (2 लाख प्रत्यक्ष और 4 लाख अप्रत्यक्ष )I
210 एम् ओ यू करार के लिए 3.10 लाख करोड़ का निवेश होगा और परियोजनाएं स्थापित होंगी और सरकार उनको ज़मीन उपलब्ध कराएगी I 13 कंपनी को 136.23 एकड़ की पट्टा समिट स्थल पर ही दे दी गई हैं I ज़रूरत पर सरकार उन्हें और ज़मीन उपलब्ध कराएगी I
सूचना तकनीकि के क्षेत्र में सरकार मांग के अनुसार ज़मीन देने के लिए तैयार है I मेडिको-सिटी के लिए– इटकी में 100 एकड़ ज़मीन देगी I औद्योगिक पार्क के लिए, जिसमे 625.19 एकड़ ज़मीन चिन्हित किया गया है I खनिज और खनन के लिए 21000 एकड़ जिसमें करीबन 14000 एकड़ वन भूमि है; शहरी विकास के लिए 4481.163 एकड़ चिन्हित किया गया है I एक्सप्रेस हाईवे- रांची –बोकारो-धनबाद, धनबाद- बोकारो – जमशेदपुर के लिए 196.92 किमी., मेट्रो 16.25 किमी. बनाया जायेगा,जिसमे क़रीबन 13000 एकड़ , तथा पार्क के लिए 30.87 वर्ग मी. और कार-पार्किंग के लिए 8050 वर्गमी यानी दोनों को मिलाकर कुल 8080.87 वर्ग मी. की आवश्यकता होगी I ये चिन्हित भूमि है और ज़रूरत पर उसकी मात्रा बढ़ सकती है I जियाडा को 210 एकड़ ज़मीन दी जाएगी I नामकुम के सोढा गांव को औधौगिक क्षेत्र के तौर पर विकसित किया जायेगा I प्रस्तावित भूमि का बाज़ार मुल्य प्रति एकड़ 25,19,600 रुपये हैI
झारखण्ड का अधिकतर भाग पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आता है I यहाँ पर छोटानागपुर कास्तकारी अधिनियम, 1908 और संथाल परगना कास्तकारी अधिनियम, 1949 विलकिंसन रूल, 1837 , पेसा(PESA) एक्ट, 1996 प्रभावी हैंI ये अधिनियम आदिवासी और गैर-आदिवासी ज़मीन को संरक्षण देते है और आसानी से इनके ज़मीन को अधिग्रहण नहीं किया जा सकता है I सरकार इन अधिनियमों में संसोधन करने का लगातार प्रयास कर रही है ताकि ज़मीन का अधिग्रहण आसानी में हो और ज़मीन पूंजीपतियों को हंस्तान्तरण किया जा सके I इतना ही नहीं ज़मीन अधिग्रहण के लिए दुसरे उपायों का भी सहारा लिया जा रहा है I जैसे – सभी प्रकार के गैर-मजरुआ ज़मीनों को इकठ्ठा कर लैंड बैंक बनाया जा रहा है I सरकार के अनुसार 21 लाख एकड़ ज़मीन बैंक में आ चुके है I
ये अधिगृहित गैर मजरुआ ज़मीन, रैयतों का ज़मीन हैं, जो भूमि का लगान देते रहे हैं, जिनका सरकार द्वारा बंदोबस्त किया जा चूका है , उन्हें अब विस्थापित किया जा रहा है I इनके अलावे गाँव की सामूहिक संपत्ति संसाधन– चारागाह की ज़मीन, जलाशय , धार्मिक स्थल, वनभूमि , नदी-नाले, इत्यादि जो सामूहिक उपयोग के लिए होते हैं, का भी अधिग्रहण कर लैंड बैंक में डाला जा रहा है I यह खतियान- भाग दो का घोर उल्लंघन है, जिसमे रिकॉर्ड ऑफ़ राइट्स दर्ज होता है I अनुसूचित क्षेत्र के PESA एक्ट के आधार पर ग्राम सभा के बिना अनुमति के ज़मीन का अधिग्रहन नहीं किया जा सकता है I लेकिन उसका भी उल्लंघन हो रहा है I इतना ही नही सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले- समता जजमेंट के आधार पर अनुसूचित क्षेत्र के ज़मीन को किसी निजी हाथों में नहीं दिया सकता है I लेकिन पूंजीपति-मुखी सरकार इन नियमों कायदे कानूनों को दरकिनार कर भूमि का लूट कर रही है I रैयतों को दबाव और तंग कर उसके ज़मीन को हडपा जाता है I
पिछले अनुभव से देखा जा सकता है कि झारखण्ड हमेशा विस्थापनका दंश झेलता रहा हैIस्वाधीनता के बाद24,15, 698 एकड़ ज़मीन अधिग्रहण किया गया है और 17,10,787 लोग विस्थापित हुए है जबकि मात्र 25 प्रतिशत को ही किसी प्रकार पुनर्वास किया गया और कोई नहीं बता सकता बाकि कहाँ गए I इसमें 80 प्रतिशत आदिवासी ही विस्थापित हुए है I भूमि का अधिग्रहण बड़े सरकारी परियोजनओं के लिए जैसे जलाशय , पॉवर प्लांट्स, सिंचाई परियोजना , खनन परियोजना, स्टील इंडस्ट्रीज आदि के लिए किया गयाIजिसका फायदायहाँ के लोगो को नहीं मिला I अभी के विस्थापन का दर पिछले के मुकाबले अधिक होगा क्यूंकि जन-संख्या का घनत्व करीबन 5 गुना बढ़ा है और इसका दबाव ज़मीन पर पड़ा है I इसका मतलब प्रति व्यक्ति औसतन ज़मीन का मालिकियत घटा है I







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