भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार या पूंजीपरस्त मीडिया हमें जो भी समझाने पे आमादा हो, हमें मोमेंटम झारखण्ड के पीछे की राजनीति को समझाना होगा| यदि हम झारखण्ड की समाज-व्यवस्था को देखें, तो निश्चित तौर पे यहाँ खासकर यहाँ के ग्रामीण इलाकों में पूंजीवाद का असर सीमित है| पर साथ ही यहाँ के समाज को हम सनातन (क्लासिकल) सामंती समाज भी नहीं कह सकते| बल्कि अगर देखा जाय तो झारखण्ड के देहातों में खास कर आदिवासी बहूल क्षेत्रों में आज भी आदिम साम्यवादी समाज के अवशेष बचे हुए हैं| गाँव के चरागाहों पर, जलाशयों पर, जंगलों पर आज भी सामाजिक मिलकियत यहाँ दिखाई देता है|
गौर फरमाने वाली बात यह है की सरकार निवेशकों के सामने 1 लाख एकर का लैंडबैंक की बात करते हुए नज़र आती है| लैंड-बैंक की ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा वनभूमि है| सरकार द्वारा यहाँ के आदिवासियों को और अन्य पिछड़े तबकों को वनभूमि के पट्टे देने का कोई इरादा नहीं दिखता, पर वनभूमि के बड़े हिस्सों को देशी विदेशी पूंजीपतियों को देने में कोई हिचक नहीं नज़र आता है| बाकि हिस्सा गैर-मजरुवा ज़मीन है, अर्थात सरकार की मिलकियत वाली वह ज़मीन जिसपर झारखण्ड के समाज-व्यवस्था में पुरे समाज का अधिकार है| गाँव के चारागाह, बाज़ार-टांड, पूजास्थल, बाड़ी-बगीचे, तालाब इन्ही को उपरोक्त श्रेणी में रखा गया है और झारखण्ड के पारंपरिक ग्रामीण जीवन में इस सामाजिक अधिकार वाले ज़मीन का एक ख़ास अहमियत है| अगर गांववालों से यह ज़मीन छीन जाय तो इसका प्रभाव यहाँ के ग्रामीण समाज-व्यवस्था एवं अर्थव्यवस्था दोनों पर नकारात्मक होगा| साथ ही सरकार द्वारा भूमि हड़पकर देशी विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के हवाले करने के इस प्रक्रिया से एक अनोखा परिवेश तैयार होगा| अन्य राज्यों में रजवाड़े-जागीरदार इस प्रकार के भू-सम्बन्ध स्थापित करते थे और ज़मीन के एक बड़े हिस्से पे चन्द घरानों का मिलकियत होता था| यह एक बहुत बड़ी विडम्बना है की झारखण्ड में जागीरदारों का वर्चस्व न होने के वजह से सरकार ही यह किरदार निभाते हुए नज़र आता है| ग्रामीण जनता के एक हिस्से के जीवन शैली बिगड़ जाएगी एवं उनका सर्वहाराकरण होगा, पारंपरिक जीवन शैली से अचानक विस्थापित बेरोजगारों की एक बड़ी फ़ौज तैयार होगी, जिससे सस्ते में अपने श्रम को बेचने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं रहेगा|
पूंजीवाद का प्रसार यहाँ सीमित होने के कारण यहाँ के प्राकृतिक संसाधन भी बहुत हद तक पूंजीपतियों के मालिकाने से बाहर रहा है| मोमेंटम झारखण्ड का असल मकसद इसे ख़त्म करना है और झारखण्ड के संसाधनों पर पूंजीपतियों के कब्ज़े को सुनिश्चित करना है| इसमें कोई आश्चर्य नहीं किलगभग ३ लाख करोड़ के निवेश में 2.1 लाख करोड़ खनिज क्षेत्र में ही है (इकनोमिक टाइम्स १८ फ़रवरी २०१७) | इसका भी 32 फीसदी विदेशी कंपनियों की पूंजी है और निवेश लोहा, ताम्बा, चूनापत्थर, मैंगनीज, सोना व अन्य मूल्यवान खनिजों के खुदाई के लिए हुआ है| इन खदानों का प्रस्तावित परिचालन भी पुरे तौर पर मशीनिकृत होगा| बाहर की कम्पनी आएगी, यहाँ के खदानों से बहुमूल्य खनिज निकालकर निर्यात करेगी, उससे यहाँ के अवाम को कुछ फायदा होते नज़र नहीं आता है| बल्कि इन संसाधनों का इस्तेमाल अगर हमारे देश के उद्द्योगों में किया जाता तो निश्चित ही विकास में यहाँ की जनता की भी भागीदारी होती| निजी कंपनियों को खदान चलने देने का अंजाम हम अपने राज्य के गोड्डा जिले में हाल में घटे खौफनाक हादसे में तलाश सकते हैं| स्थायी रोज़गार के कोई अवसर इन प्रोजेक्टों से तैयार होते नहीं दिख रहे, बल्कि फायदा यही होगा की यहाँ का खनिज सम्पदा देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों द्वारा लूट के लिए खुल जायगा|
अगले जिस क्षेत्र में सबसे ज्यादा निवेश प्रस्तावित है वो है आवास एवं शहरी विकास| फिर से इसमें अगर किसी को फायदा तो उन कंपनियों को जिन्हें ठेकेदारी हासिल होगा एवं इससे भी स्थायी रोज़गार के अवसार नज़र नहीं आते| स्मार्ट सिटी बनाने के लिए MOU तो साइन हुए हैं, पर सवाल यह पैदा होता है की ये स्मार्ट सिटी किनके लिए बन रहे हैं? आलिशान शौपिंग मॉल और चमक धमक वाले इन महंगे शहरों में गरीब जनता के लिए कितना स्थान होगा? विकाश के इस मॉडल से अवाम का कोई लेना देना नहीं होता, भाजपा शासित अन्य राज्यों के अनुभव से हमे यह स्वतः ही पता चल जाता है| हालाँकि पचास 40 जगहों को चिन्हित किया गया है जहाँ यूनिवर्सल हाउसिंग का प्रस्ताव है, पर इन जगहों में कुल्लम निवेश बहुत ही कम एवं नाकाफी है| इन स्मार्ट सीटीयों में गरीब जनता का कोई स्थान न होने के कारण वे शहर के इर्द गिर्द अपने बस्तियां स्थापित करने को मजबूर होंगे| इन बस्तियों में बुनियादी नागरिक सुविधा के नाम पे क्या उपलब्ध होगा, इसका अनुमान हम वाइब्रेंट गुजरात द्वारा तैयार किये बस्तियों का हालत देखकर सहज ही अनुमान कर सकते है| National Sample Survey (NSS) द्वारा किये गए एक सर्वे के मुताबिक इन बस्तियों की स्थिति देश में सबसे बदतर है| साथ ही टाइम्स ऑफ़ इंडिया में १७ मई २०१६ को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार गुजरात कुल आबादी के लिहाज़ से सूचि में ९वे स्थान पर है, और यहाँ देश के आबादी का ५ % बस्ता है, जबकि की इस तरह के बस्तियों में रहने को मजबूर लोगों के 10 % से अधिक लोग गुजरात में रहते हैं|
साथ ही मोमेंटम झारखण्ड में न तो कृषि को बढ़ावा देने वाले कोई उद्योग नज़र आते हैं, न ही बड़े पैमाने पर रोज़गार के अवसर प्रदान करने वाले| सिंचाई, खाद,बीज कृषि-औज़ार या कृषि पे आधारित उद्द्योगों के नाम पर महज़ एक प्रस्ताव आया है, जबकि इस राज्य के आबादी का एक बड़ा हिस्सा कृषि कर ही निर्भर है| जहाँ निजी शिक्षण संस्थानों में 500 करोड़ तक के निवेश आये हैं, कृषि अनुसंधान का जो एक मात्र प्रोजेक्ट आया है, वह भी महज़ 10 66 करोड़ का निवेश है| झारखण्ड एक ऐसा राज्य है जो की खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं है और मांग के आधे से ज्यादा खाद्यान्न दुसरे राज्यों से मंगाना पड़ता है| झारखण्ड में कृषिकार्य के भूमि के पट्टे ऐसे ही दुसरे कई राज्यों के तुलना में छोटे हैं और कृषि के आधारित संरचना की कमी के कारण, खेतों में पैदावार भी कम है, जिस वजह से ये खेत किसान के परिवारों का भरण पोषण के लिए नाकाफी हैं| झारखण्ड से लोगों का पलायन का भी यही मुख्य वजह है| ऐसे स्थिति में देशी-दिदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के हित में कृषि की उपेक्षा सरकार के रवैये को भली भांति दर्शाता है|
केवल कॉर्पोरेट हितों को सामने रख विकास का जो मॉडल मोमेंटम झारखण्ड द्वारा दर्शाया जा रहा है उससे सिर्फ चन्द लोगों का ही विकास मुमकिन नज़र आता है| भाजपा राजनैतिक तौर पे इजारेदार सरमाया का नुमाइंदगी करता है, और इसमें कोई शक की गुंजाईश नहीं है कि उसी तबके का तब्काती स्वार्थ भाजपा के लिए सर्वोपरी है| वाइब्रेंट गुजरात के तर्ज पर देशी विदेशी इजारेदार पूंजी का खिदमत करना और देश के संसाधन और जनता को कॉर्पोरेट लूट के सामने छोड़ देना भाजपा का राजनैतिक कार्यक्रम का हिस्सा है| झारखण्ड जैसा राज्य जो प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न है वहां यह बात और सटीक बैठता है| इसमें कोई दो राय नहीं कि झारखण्ड में कृषि और उद्द्योग दोनों के लिए अपर संभावनाएं हैं, ज़रूरत है जनपक्षीय वैकल्पिक नीति की जिससे झारखण्ड के मेहनतकश अवाम को यहाँ के विकास में भागीदार बनाया जा सके|






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